मीराबाई

परिचय – : यह लेख 14वीं – 15वीं सदी की एक राज परिवार की बहू की धार्मिक मनोवृति की ओर इंगित कर रहा हैं । यह जो मारवाड़ से मेवाड़ के राजकुंवर भोजराज के द्वारा विवाहकर लायी बहू प्रसिद्ध कृष्णभक्त मीराबाई है। उनका कृष्णप्रेम जग जाहिर हैं। चित्तौड़ राजमहल में एक कंवराणीसा [ नई दुल्हन ]का विवाह के  बाद पदार्पण हुआ । पुरा राजमहल एव मेवाड़ अपनी नई कंवराणी सा के आगमन से हर्षित एवं उल्लासित हो रहा था । लेकिन कंवराणीसा जो राजा भोजराज की दुल्हन [ मीरां ]बनकर आयीं थी एक सामान्य बालिका थीं। वे खुदको परिस्थिति के अनुकूल नहीं ढाल पा रही थीं ! मीरा अपने ससुराल चित्तोड़ आकर नये परिवेश , नये रिश्तों में जकड़न या कठिनाई महसूस कर रही थी । हालाकि उनके लिये सुख सुविधा की कोई कमी नहीं थीं । लेकिन उनको सुख सुविधा की चाहत भी नहीं थी । उनके दिलोदिमाग पर श्रीकृष्ण की भक्ति का रंग चढ़ चुका था । रात दिन श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहने वाली मीरा भला अपने नये रिश्तों से कैसे खुश रहती। वे तो श्रीकृष्ण को ही अपना पति मानती थीं ‘ राजा भोजराज को पति के रूप में स्वीकार नहीं करती थी । भोज राज ने बहुत प्रयास किये कि मीरा कृष्ण भक्ति छोड़कर अपना मन रिश्तों मे लगाये। किन्तु मीरा को तो कान्हा के अतिरिक्त कोई अपना लगता ही नहीं था। मीरां को कृष्ण भक्ति के कारण अनेक कष्ट झेलने पड़े । उलाहने सहने पड़े और मारने के प्रयास भी हुए किन्तु मीरा हर बार बच जाती थीं ! राज परिवार को मीरा द्वारा साधु संगति करना, बाहर जाना नहीं सुहाता था । राज परिवार अपने रीति रिवाजों के अनुसार उन्हें महलो में कैद रखना चाहता था लेकिन मीरा तो भक्ति का ऐसा परिन्दा थी कि खुले आसमान में उड़कर अपने प्रिय आराध्य श्री कृष्ण को पाना चाहती थी । बहुत कुछ सहने के बाद भी मीरा को लगा कि यहां [ चित्तौड ] रह कर अपने आराध्य को पाना संभव नहीं है तो उन्होंने चित्तौड़ से जाना ही उचित समझा ! अपने मायके में कुछ समय व्यतीत कर वे वृंदावन चली गयी और वहांसे द्वारका के लिये प्रस्थान किया ! द्वारका में मीरा भक्ति में लीन रहती ! वहां पर भी राजपरिवार द्वारा अनेक बार दुत भेजने से वे परेशान हो गयी और श्रीकृष्ण की मूरत के सामने जाकर अरज किया कि प्रभु अब तो मुझे मुक्ति प्रदान करो ! कहते हैं कि मीरां को श्रीकृष्णने अपनी मूरत में विलिन कर लिया और ओर भक्त मीरा इस संसार से विलुप्त हो गयीं। मीरा तो चली गयी लेकिन अपने पिछे भक्ति का अलख जगा गयी जो आज भी निरन्तर भक्ति मार्ग के लिये भक्तों को राह दिखा रहा है ! उनकी भक्ति में जोशक्तिथी, निश्छल भाव था पीढ़ियो के लिये आदर्श बन गया । उनकी सच्ची भक्ति, लगन का ही परिणाम है कि हम उनके लिये अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करते है । उदयपुर में साहित्य अकादमी नईदिल्ली व जनार्दन राय नागर विद्यापीठ वि.वि. द्वारा दो दिवसीय मीरा महोत्सव का आयोजन हुआ। इसमें साहित्यकारों ने अपने विचार रखे । मीरा का जीवन साधारण किन्तु संघर्षों एवं चुनौतियों से भरा हुआ था उन्होंने भौतिक सुखों को त्यागकर आत्मिकखोज और भक्ति का मार्ग अपनाया । मीरा ने अनेक कविताओं की रचना की ! जिनमें संघर्ष और असाधारण शक्ति सामान्य मापदण्डों से परे ले जाती हैं । मीरा के पदों में अपार गहराई, वेदना है । मीरा ने रुढ़ियो को नकारा और एक सच्चे भक्त की वेदना को उजागर किया ! उनके पद श्रीकृष्ण से मिलन की आकांक्षा में रचे गये है। उनके द्वारा  रचित पदों का गायन होता हैं और भक्त भक्ति रस में हिलोरे लेते हैं। मीरा द्वारा रचित कुछ पद – पायोजी मैंने राम रतन धन पायो , दरस बिनु दुखन लागे नैन , ए री मैं तो प्रेम दिवानी , ओ जी हरि कीत गए नेह लगा, मैं तो श्री मिरिधर आगे नाचूंगी जैसे पदकी रचना मीरा ने की ! संक्षिप्त – मीरा द्वारा रचित पदों से ज्ञात होता है कि वे श्रीकृष्ण की ऐसी भक्त थी कि भले ही प्राण चले जाएं पर अपने आराध्य से दूर रहना मंजूर नहीं था। इस संसार में मीरा ने श्रीकृष्ण के अलावा किसी में मन नहीं लगाया ‘ मीरा उच्चकोटि की कवयित्री रही थीं ! भक्ति के क्षेत्र में आने वाली बाधा को पार किया । अपनी रचनाओं के माध्यम से भक्त की मनोदशा का बसुबी चित्रण किया ! खुशी , आह्लाद , विरह की मनोदशा का जीवन्त निरूपण हमें उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है । इस तरह हम देखते है कि भक्ति वत्सल मीरा असाधारण व्यक्तित्व की धनी थीं !

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