राजपूती परम्पराएं – इस समाज की जड़ें अति प्राचीन ‘ हैं जो प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित वंश है। राजपूत समाज अपनी शुरविरता के लिये जाना जाता हैं । समाज के स्त्री-पुरुष अपनी मान मर्यादा का निर्वाह करना अच्छी तरह जानते है। अपने कुल की रीतियों का पालन करना समाज के लोगों को प्रिय है। दुनिया जिन नियमों या परम्पराओं को रूढ़िवादिता कहती है राजपूती समाज इन परम्पराओं का निर्वहन कर गौरवान्वित महसूस करते हैं । हांलाकि कुछ परम्पराओं को आधुनिकता के साथ सामंजस्य कर अपनाते है। समाज हजारों सालों से चली आ रही परम्पराओं को आज भी निर्वाह करता हैं। विशेषकर आज के युवा भी अपने कुल के नियमो का पालन स्वेच्छा से करते हैं। समाज में नौनिहालों में बचपन से ही संस्कारों के बीज बो दिये जाते है । विशेषकर बच्चियों की परवरिश इस तरह से होती है कि वे युवावस्था में आ अपने को नियमो के पालन में अपने को समर्थ पाती है । समाज के बड़े बुजुर्गो का मार्गदर्शन रहता है कि बच्चे उनके अनुगामी रहें। . कुछ परम्पराएं – भाषा – समाज में कुछ ऐसे शब्द बोले जाते हैं जो सम्मान को दर्शाते है जैसे बड़ों के पुकारने पर होकम व कुछ कहने के लिये फरमाओ शब्दों का प्रयोग करते है। इसी तरह बड़े को पुकारने के लिये भी होकम कहकर बुलाते है जेसे दाता होकम । अभिवादन के लिये खम्मागणी या घणी खम्मा शब्द का प्रयोग किया जाता है। आने या जाने वाले के लिये पधारना या पधारोसा और बैठने के लिये बिराजो जैसे शब्दों का प्रयोग खाने के लिये – जीमण जिमाओ या अरोगाओ का प्रयोग । सोने के लिये – पौढ़ाओ आदि सम्मान सूचक शब्दों का उपयोग घर के सदस्यों के लिये किया जाता है । इसके अतिरिक्त शादी ब्याह एवं मरण मौत के लिये भी समाज की अपनी परम्पराएं हैं । बालक के जन्म से पूर्व व पश्चात अनेक रस्में होती है । होली के त्यौहार पर बच्चे की ढुंढ की रस्म होती है। विवाह – यह प्रथा अनादि काल से चली आ रही है । सतयुग में माता पार्वती का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ । त्रेतायुग में माता सीता का विवाह भगवान श्री राम के साथ हुआ । द्वापर युग में श्रीकृष्ण भगवान का विवाह रुक्मणी के साथ हुआ । कलयुग में हम देख ही रहे है वही प्रथाएं आज भी कायम है। कुछ बदलाव जरूर हुए है । इस तरह भारत वर्ष की प्राचीन गौरवमयी प्रथाएं एवं संस्कृति आजभी समाज अपने में सहेजे एवं समेटे हुए है।